जैसा कि हम पिछले काफी वर्षों से देखते आ रहे हैं कि पृथ्वी के पर्यावरण व जलवायु में निरंतर परिवर्तन आ रहा है और उसके आने का कारण कहीं ना कहीं मानवीय गतिविधियों एवं क्रियाओं को जिम्मेदार ठहराया जाता है इसका ही एक उदाहरण हम अपने आसपास में प्रकृति में हो रहे परिवर्तन से लगा सकते हैं। जैसा कि अगर हम मौसम की बात करें तो अभी मार्च का महीना चला हुआ है लेकिन अभी से प्रचंड गर्मी मैदानी इलाकों एवं इसके साथ-साथ कुछ पर्यटन नगरों में भी भारी मात्रा में देखने को मिल रही है जो गर्मी हमें अप्रैल और मई के महीने में देखने को मिलती थी वह हमें दो महीने पूर्व ही महसूस हो रही है जिसे कि हम पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन का नाम देने में कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। हम इसमें देख सकते हैं कि शिवालिक क्षेत्र में आम के पौधों की ज्यादा भरमार रहती है और अगर हम आज इन आम के वृक्षों में देखें तो इनमें अंकुरित फूट चुका है जो कि इस बात का गवाह है कि इस वर्ष हमें तय समय से पहले ही आम फल (मेंगिफेरा इंडिका) को खाने का लुफ्त मिल जाएगा। इन आम के वृक्षों में इस तरह का अंकुरित होना मई एवं जून के महीने में देखने को मिलता था तथा तत्पश्चात दक्षिण पश्चिम मानसून व बरसात का मौसम प्रदेश या देश में दस्तक हो जाती थी परंतु जलवायु परिवर्तन के कारण यह हमें समय से पूर्व ही देखने को मिल रहा है। जलवायु परिवर्तन को न केवल इंसान बल्कि पेड़ पौधे, वनस्पति एवं जीव जंतु भी महसूस करते हैं। आज विश्व में कई प्रकार की संधियां, संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन संधि, जलवायु परिवर्तन को कम करने हेतु आयोजित की जाती रही हैं परंतु क्या जो देश इस को बढ़ावा देने के लिए अग्रसर हैं क्या वे इन संधियों को स्वीकार करते हैं या केवल अपने विकास एवं आर्थिकी को बढ़ाने हेतु सिर्फ जलवायु परिवर्तन को एक भयानक रूप प्रदान करने की ओर अग्रसर हो रहे हैं। पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन ना केवल इस पृथ्वी के लिए खतरा है बल्कि मानव जाति के भविष्य को भी इससे आने वाले कुछ वर्षों में खतरा हो सकता है या फिर मानव जाति पूर्णता इस सुंदर ग्रह से नष्ट हो सकती है इसका भी डर सताता रहता है। इसके अतिरिक्त आए दिन हम पृथ्वी के तापमान में हो रही लगातार बढ़ोतरी को भी नजरअंदाज नहीं कर सकते हैं, इससे न केवल मानव जाति परंतु विभिन्न प्रकार के पौधों, पर्यावरण व जीव जंतुओं की अनेकों प्रजातियों के लिए भी एक गहरा संकट पैदा हो गया है। इसे समय रहते उचित योजना, जन जागरूकता एवं विकसित एवं विकासशील राष्ट्रों के आपस में उचित समन्वय से ही कमी लाई जा सकती है। और इस कार्य को करने के लिए वर्तमान पीढ़ी के पास केवल कुछ समय ही शेष बचा है।
आइए हम सब एकजुट होकर पर्यावरण संरक्षण की ओर कदम बढ़ाएं और पृथ्वी को स्वच्छ, सुंदर एवं खुशहाल बनाने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे सकें।