दिल्ली हाईकोर्ट जज के बंगले में आग; भारी नकदी बरामदगी ने मचाया हड़कंप, ट्रांसफर के साथ जांच की मांग तेज

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Delhi News: दिल्ली हाईकोर्ट के जज जस्टिस यशवंत वर्मा के आवासीय बंगले में 20 मार्च 2025 को आग लगने की घटना ने एक सनसनीखेज खुलासा किया है। आग बुझाने के दौरान जज के घर से भारी मात्रा में नगद राशि बरामद हुई, जिसने न्यायिक गलियारों में हड़कंप मचा दिया। इस घटना ने न केवल न्यायपालिका की साख पर सवाल उठाए हैं, बल्कि सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम को भी त्वरित कार्रवाई के लिए मजबूर कर दिया।

घटना का विवरण: आग से शुरू हुआ विवाद
अंग्रेजी अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, घटना के समय जस्टिस यशवंत वर्मा दिल्ली में मौजूद नहीं थे। उनके परिवार के सदस्यों ने आग लगने की सूचना अग्निशमन विभाग और स्थानीय पुलिस को दी। फायर ब्रिगेड ने आग पर काबू पाने के बाद एक कमरे में भारी मात्रा में नकदी देखी, जिसकी राशि अभी आधिकारिक तौर पर घोषित नहीं की गई है। इस अप्रत्याशित बरामदगी ने तुरंत जांच की मांग को हवा दे दी।

स्थानीय पुलिस ने मामले को गंभीरता से लेते हुए अपने वरिष्ठ अधिकारियों को सूचित किया, जिसके बाद यह जानकारी सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश (CJI) संजीव खन्ना तक पहुंची। CJI ने इसे बेहद संवेदनशील मानते हुए कॉलेजियम की आपात बैठक बुलाई।

कॉलेजियम का फैसला: ट्रांसफर या जांच?
कॉलेजियम ने सर्वसम्मति से निर्णय लिया कि जस्टिस वर्मा को तत्काल प्रभाव से दिल्ली हाईकोर्ट से उनके मूल हाईकोर्ट, इलाहाबाद हाईकोर्ट में स्थानांतरित किया जाए। जस्टिस वर्मा अक्टूबर 2021 में इलाहाबाद हाईकोर्ट से दिल्ली हाईकोर्ट आए थे, और अब उन्हें वापस उसी कोर्ट में भेजा गया है। हालांकि, कॉलेजियम के कुछ सदस्यों ने इस कार्रवाई को अपर्याप्त बताया। उनका तर्क था कि केवल ट्रांसफर से समस्या का समाधान नहीं होगा, बल्कि इससे न्यायपालिका की विश्वसनीयता पर और सवाल उठेंगे।

इन सदस्यों ने सुझाव दिया कि जस्टिस वर्मा से इस्तीफा मांगा जाए। यदि वे इस्तीफा देने से इनकार करते हैं, तो CJI को 1999 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित इन-हाउस जांच प्रक्रिया शुरू करनी चाहिए। इस प्रक्रिया के तहत, भ्रष्टाचार या अनुशासनहीनता के आरोपों पर CJI पहले संबंधित जज से जवाब मांगते हैं। अगर जवाब संतोषजनक नहीं होता, तो एक जांच पैनल गठित किया जाता है, जिसमें एक सुप्रीम कोर्ट जज और दो हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश शामिल होते हैं।

जनता और विशेषज्ञों की प्रतिक्रिया
इस घटना ने सोशल मीडिया और कानूनी हलकों में व्यापक बहस छेड़ दी है। कई लोगों का मानना है कि ट्रांसफर महज एक सतही कदम है, और बिना जांच के इस मामले को दबाना न्यायिक पारदर्शिता के खिलाफ है। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसी घटनाएं आम जनता के न्यायपालिका पर भरोसे को कमजोर करती हैं, खासकर तब जब दोषी के खिलाफ ठोस कार्रवाई न हो।

आगे क्या?
20 मार्च 2025 तक की नवीनतम जानकारी के अनुसार, जस्टिस वर्मा का ट्रांसफर हो चुका है, लेकिन जांच को लेकर कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। यह मामला न केवल दिल्ली हाईकोर्ट बल्कि समूचे न्यायिक तंत्र के लिए एक चुनौती बन गया है। क्या इस घटना के बाद इन-हाउस जांच शुरू होगी, या इसे ट्रांसफर के साथ दबा दिया जाएगा? यह सवाल अभी अनुत्तरित है, लेकिन जनता और कानूनी बिरादरी की निगाहें सुप्रीम कोर्ट के अगले कदम पर टिकी हैं।

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